मैं सालों से यह बहस देख रहा हूं और वही तर्क बार-बार लौटते हैं।
हल मुश्किल नहीं है। इसके लिए धैर्य, थोड़ा बजट और ज़िम्मेदारी लेने वाला कोई चाहिए।
अगर हम इसे ठीक कर लें, तो सबसे ज़्यादा फ़ायदा उन्हें होगा जिनकी आवाज़ सबसे कम सुनी जाती है।
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इस स्तंभ में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं।
यह एक डेमो ख़बर है: इसमें सभी नाम, जगहें, संस्थाएं और आंकड़े काल्पनिक हैं।



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